नितिन गडकरी अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं. पर यह समझना भूल होगी कि वे बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देते हैं.
वे अपने लक्ष्य को कभी आंखों से ओझल नहीं होने देते.
उनकी ताकत संघ से आती है. वे भी नागपुर के रहने वाले हैं.
ऐसा माना जाता है कि भाजपा में रहते हुए राजनीति में सफल होने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन काफी है. लेकिन यह एक अवधारणा मात्र है- सच्चाई से थोड़ा दूर.
हां, वास्तविकता इसके उलट है. संघ के विरोध के बाद आप भाजपा में बढ़ नहीं सकते. यह नियम है. पर हर नियम के कुछ अपवाद होते हैं.
बीजेपी का '160 क्लब'
पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ऐसे ही नेताओं में थे. राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी कुछ कुछ उसी रास्ते पर हैं.
साल 2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नरेन्द्र मोदी को संघ को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा.
उस समय भाजपा में एक बड़ी तगड़ी लॉबी थी जिसका मानना था कि पार्टी को लोकसभा की 160 से 180 सीटें मिलेंगी.
ऐसे में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व सहयोगी दलों को मंजूर नहीं होगा. तो प्रधानमंत्री पद के तीन उम्मीदवार उभर कर आए.
उस समय लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, जिनको लाल कृष्ण आडवाणी और उनके सहयोगियों का समर्थन हासिल था.
दूसरे नितिन गडकरी जो संघ की पसंद के तौर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. पर संघ के समर्थन के बावजूद अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल हासिल नहीं कर पाए.
तीसरे उम्मीदवार थे, उस वक्त पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह. तीनों एक दूसरे को पसंद तो नहीं करते थे लेकिन एक बात पर तीनों में सहमति थी. वह था नरेन्द्र मोदी का विरोध.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़ने से पहले उस समय के भाजपा के दोनों अध्यक्षों से बात की.
राजनाथ सिंह से उनकी बातचीत का किस्सा फिर कभी. नितिन गडकरी की बात करते हैं.
नीतीश कुमार ने गडकरी से सीधा सवाल किया कि क्या आप लोग नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेंगे.
गडकरी का सीधा जवाब था, "मैं इस बात की गारंटी देता हूं कि हमारी पार्टी चुनाव से पहले किसी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करेंगी."
गडकरी मानकर चल रहे थे कि उन्हें अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल भी मिलेगा और लोकसभा चुनाव के समय पार्टी की कमान उनके हाथ में ही रहेगी.
पूर्ति घोटाले की ख़बर ने उन्हें दोबारा अध्यक्ष नहीं बनने दिया. इसके लिए वे अब तक अपनी ही पार्टी के नेताओं को ज़िम्मेदार मानते हैं.
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