Tuesday, December 25, 2018

'अमित शाह के बुरे दिनों में नितिन गडकरी उन्हें घंटों इंतजार करवाते थे'

नितिन गडकरी अपनी साफगोई के लिए जाने जाते हैं. पर यह समझना भूल होगी कि वे बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देते हैं.

वे अपने लक्ष्य को कभी आंखों से ओझल नहीं होने देते.

उनकी ताकत संघ से आती है. वे भी नागपुर के रहने वाले हैं.

ऐसा माना जाता है कि भाजपा में रहते हुए राजनीति में सफल होने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन काफी है. लेकिन यह एक अवधारणा मात्र है- सच्चाई से थोड़ा दूर.

हां, वास्तविकता इसके उलट है. संघ के विरोध के बाद आप भाजपा में बढ़ नहीं सकते. यह नियम है. पर हर नियम के कुछ अपवाद होते हैं.

बीजेपी का '160 क्लब'

पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत ऐसे ही नेताओं में थे. राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी कुछ कुछ उसी रास्ते पर हैं.

साल 2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नरेन्द्र मोदी को संघ को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

उस समय भाजपा में एक बड़ी तगड़ी लॉबी थी जिसका मानना था कि पार्टी को लोकसभा की 160 से 180 सीटें मिलेंगी.

ऐसे में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व सहयोगी दलों को मंजूर नहीं होगा. तो प्रधानमंत्री पद के तीन उम्मीदवार उभर कर आए.

उस समय लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, जिनको लाल कृष्ण आडवाणी और उनके सहयोगियों का समर्थन हासिल था.

दूसरे नितिन गडकरी जो संघ की पसंद के तौर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने. पर संघ के समर्थन के बावजूद अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल हासिल नहीं कर पाए.

तीसरे उम्मीदवार थे, उस वक्त पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह. तीनों एक दूसरे को पसंद तो नहीं करते थे लेकिन एक बात पर तीनों में सहमति थी. वह था नरेन्द्र मोदी का विरोध.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़ने से पहले उस समय के भाजपा के दोनों अध्यक्षों से बात की.

राजनाथ सिंह से उनकी बातचीत का किस्सा फिर कभी. नितिन गडकरी की बात करते हैं.

नीतीश कुमार ने गडकरी से सीधा सवाल किया कि क्या आप लोग नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेंगे.

गडकरी का सीधा जवाब था, "मैं इस बात की गारंटी देता हूं कि हमारी पार्टी चुनाव से पहले किसी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करेंगी."

गडकरी मानकर चल रहे थे कि उन्हें अध्यक्ष पद का दूसरा कार्यकाल भी मिलेगा और लोकसभा चुनाव के समय पार्टी की कमान उनके हाथ में ही रहेगी.

पूर्ति घोटाले की ख़बर ने उन्हें दोबारा अध्यक्ष नहीं बनने दिया. इसके लिए वे अब तक अपनी ही पार्टी के नेताओं को ज़िम्मेदार मानते हैं.

Wednesday, December 12, 2018

बुर्का पहन थियेटर में केदारनाथ देखने पहुंचीं सारा अली खान

सारा अली खान की फिल्म केदारनाथ को दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है. ये सारा की डेब्यू फिल्म है और इसे लेकर सारा काफी उत्साहित भी हैं. उन्होंने फिल्म के प्रमोशन में कोई कसर नहीं छोड़ी. हाल ही में सारा ने बुर्का पहनकर दर्शकों के बीच थिएटर में फिल्म भी देखी.

फिल्म की को-राइटर कनिका ढिल्लन ने इंस्टाग्राम पर फोटोज शेयर की. जिसमें सारा अली खान बुर्के में नजर आ रही हैं. वे नुसरत के रूप में फिल्म देखने पहुंचीं. उनके साथ मां अमृता सिंह भी हैं. फोटो में वे फैन्स के साथ पोज देती नजर आ रही हैं. कनिका ने कैप्शन में लिखा- जब आप अपनी फिल्म की प्रतिक्रिया जानने, दर्शकों के बीच जाकर फिल्म देखते हैं. ढेर सारे प्यार के लिए शुक्रिया.

तरण आदर्श ने एक ट्वीट में फिल्म के लेटेस्ट कलेक्शन आंकड़े जारी किए. ट्वीट के मुताबिक, फिल्म ने शुरुआती चार दिनों में 32 करोड़ रुपये कमा लिए हैं. फिल्म ने पहले पहले दिन यानी शुक्रवार को 7.25 करोड़ रुपये, शनिवार को 9.75 करोड़, रविवार को 10.75 करोड़ रुपये और सोमवार को 4.25 करोड़ रुपए कमाए.

फिल्म की कमाई से खुश सारा अली खान ने मुंबई में लोगों को प्रसाद बांटा. फिल्म 7 दिसंबर, 2018 को रिलीज हुई. केदारनाथ में सारा के साथ सुशांत सिंह राजपूत अभिनय करते नजर आए. इसका निर्देशन अभिषेक कपूर ने किया.

फिल्म अपने कंटेंट को लेकर विवादों में भी रही. फिल्म पर लव जिहाद दिखाने का आरोप लगा है. इस वजह से केदरानाथ को उत्तराखंड में पूरी तरह से बैन किया गया है. हाल ही में सारा अली खान ने एक इंटरव्यू के दौरान बैन लगने पर निराशा जताई.

प्रमुख केसीआर गुुरुवार को तेलंगाना के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. केसीआर गवर्नर हाउस में ही दोपहर को करीब 1.30 बजे शपथ लेंगे. आपको बता दें कि तेलंगाना की 119 सीटों में टीआरएस को 88 सीटें मिली हैं. वहीं, असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM को 7 सीटें मिली हैं. BJP को एक और कांग्रेस को 19 सीटें मिली हैं.

मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत तो मिल गया है लेकिन मुख्यमंत्री चुनने में पसीने छूट रहे हैं. मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ के बीच कुर्सी की जंग चल रही है तो वहीं राजस्थान में भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट के कार्यकर्ता नारेबाजी कर रहे हैं. सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया विधायकों के साथ अलग बैठक कर रहे हैं. वहीं अशोक गहलोत ने भी सीएम पद पर फैसला राहुल गांधी पर छोड़ दिया है.

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