महाराष्ट्र में महीने भर लंबी राजनीतिक रस्साकशी के बाद आख़िरकार सरकार का गठन हो गया है.
नई सरकार के घटक दलों एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस ने विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर दिया है.
ऐसे में ये कहा जा सकता है कि नई सरकार ने अपना काम करना शुरू कर दिया है.
लेकिन किसी भी गठबंधन सरकार को चलाना दो खंबों के बीच बंधी रस्सी पर चलने जैसा काम होता है.
ऐसा करना तब और ज़्यादा मुश्किल हो जाता है जब गठबंधन के घटक दलों के बीच किसी तरह की वैचारिक सहमति का अभाव हो.
ऐसे गठबंधन पर चलने वाली सरकार हमेशा ही एक तरह की अनिश्चितता की शिकार बनी रहती है.
महाराष्ट्र में वर्तमान राजनीतिक स्थिति के अनुसार बीजेपी किसी भी तरह के राजनीतिक हथकंडे अपनाने के लिए स्वतंत्र है.
लेकिन अगर गठबंधन के घटक दलों ख़ासकर कांग्रेस की ओर से इस तरह का कोई क़दम उठाया जाएगा तो कुछ लोग सिद्धांतों की बात करेंगे.
ऐसे में नई महाराष्ट्र सरकार के काम-काज पर पर पैनी नज़र रखी जाएगी.
सरकार के अंदर और बाहर, सहयोगियों और विरोधियों समेत सभी पक्ष सरकार में किसी भी तरह के मतभेदों पर निगाह रखेंगे.
महाविकास अघाड़ी सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल सरकार की स्थिरता को लेकर होगा.
कांग्रेस और एनसीपी बीते कई सालों से शिवसेना से लड़ती आ रही हैं.
साल 1995 में शिवसेना ने कांग्रेस की हार में बड़ी भूमिका अदा की थी.
ऐसे में इस पृष्ठभूमि के साथ ये तीनों पार्टियां अपने गठबंधन को कब तक बचाने में कामयाब होंगी, ये एक बड़ा सवाल है.
इसके साथ ही एक सवाल ये भी है कि इन तीनों पार्टियों का आधार भी कमोवेश एक जैसा ही है.
और इनके बीच नई सरकार में ज़्यादा से ज़्यादा शक्ति हासिल करने को लेकर संघर्ष की ख़बरें आती रहेंगी.
ऐसे में राजनीतिक हल्क़ों में ये चर्चा चल रही है कि ये सरकार आंतरिक कलह के दबाव में आएगी या नहीं?
सरकार के अंदर जारी सत्ता संघर्ष की जो ख़बरें आ रही हैं, उनसे ये पता चलता है कि उन्हें ये पता नहीं है कि वे कितनी नाज़ुक स्थिति में हैं.
जब इस तरह के गठबंधनों में पार्टी नेता इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि उन्हें सिर्फ अपनी व्यक्तिगत और दलीय महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करनी है तो इस तरह के प्रयोग बुरी तरह फेल होते हैं.
एनसीपी नेता अजित पवार ने अपनी सरकार बनाने से पहले इस तरह की सोच का प्रदर्शन किया था.
अगर मुख्यमंत्री बनने की चाहत रखने वाला कोई व्यक्ति सत्ता से आगे कुछ नहीं देख पाता है तब आप एक आम पार्टी वर्कर से क्या उम्मीद लगा सकते हैं.
महाराष्ट्र में जब ये साफ़ हो गया कि शिवसेना और बीजेपी के बीच पटरी नहीं खा रही है. ऐसी स्थिति में अगर कोई व्यक्ति नई सरकार की संरचना और उसके भविष्य को लेकर सोचने की जगह सिर्फ़ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के बारे में सोचे तो इस तरह की राजनीति को मौक़े तलाशने की राजनीति कहना चाहिए.
अब चिंता की बात बस ये है कि इन्हीं अजित पवार को नई सरकार में उप मुख्यमंत्री का पद कब मिलेगा.
अगर एक नेता इतनी स्वार्थ भरी राजनीति करेगा तो उसके समर्थक भी इस सरकार को चंद दिनों की चांदी की तरह देखेंगे.
जब तक पार्टी के बड़े नेता इस सरकार की दिशा और दशा को ध्यान में रखकर राजनीतिक सामंजस्यता करने के लिए इच्छुक नज़र नहीं आएंगे तब तक दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेता राजनीतिक सामंजस्य नहीं बिठाएंगे.
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